सर्वोच्च न्यायालयाके इतिहास में 13 मौके ऐसे, जब बहुमत के सामने खारिज हो गया

सुप्रीम कोर्ट की वर्किंग में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) का ओहदा सबसे ऊपर माना जाता है। सीजेआई मास्टर ऑफ रोस्टर होता है। लिहाजा टॉप कोर्ट को चलाने की जिम्मेदारी उस पर ही होती है। माना जाता है कि सीजेआई बाकी सभी जस्टिसेज से हर मामले में आगे होता है। लेकिन एक सच ये भी है कि 13 मौके सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में ऐसा भी रहे जहां सीजेआई का फैसला बहुमत के सामने खारिज हो गया।

सेम सेक्स मैरिज की सुनवाई के बाद सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने जो फैसला दिया उससे साथी जजों की राय अलग थी। सीजेआई का कहना था कि ऐसे लोग अपने रिश्ते को पहचान देने की मांग कर सकते हैं। उनका कहना था कि संविधान में इस बात की आजादी दी गई है। जबकि संवैधानिक बेंच में शामिल जस्टिसेज एस रविंदर भट्ट, हिमा कोहली और पीएस नरसिम्हा ने चंद्रचूड़ के नजरिये से अलग अपनी राय रखी थी।
सीजेआई का कहना था कि कोर्ट स्पेशल मैरिज एक्ट के प्रावधानों को खारिज नहीं कर सकता। ये संसद का अधिकार क्षेत्र है। उनकी राय थी कि हेट्रोसेक्सुअल रिलेशनशिप में ट्रांसजेंडर पर्सन पर्सनल लॉ या फिर दूसरे ऐसे कानूनों के तहत विवाह कर सकते हैं। ऐसे लोग बच्चा गोद भी ले सकते हैं। हालांकि अपने फैसले के बचाव में वो ये भी बोले कि वैधानिक शासन के अभाव और भारत जैसी व्यवस्था में जहां विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों का बंटवारा होता है, अदालत के लिए हस्तक्षेप करना मुश्किल हो जाता है।

भारत आजाद तो 1947 में हो गया था अलबत्ता सुप्रीम कोर्ट का गठन यहां 1950 में हो सका। 28 जनवरी 1950 को भारत के लोकतांत्रिक गणराज्य बनने के दो दिन बाद सुप्रीम कोर्ट अस्तित्व में आया। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सुप्रीम कोर्ट का मुखिया होता है। टॉप कोर्ट में अधिकतम 34 जस्टिस होते हैं। इसके पास मूल, अपीलीय और सलाहकार क्षेत्राधिकार के रूप में व्यापक शक्तियां होती हैं। संविधान के अनुच्छेद 142 के अनुसार, भारत के राष्ट्रपति का यह कर्तव्य है कि वो सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों को लागू करें। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु 65 वर्ष होती है। जस्टिसेज को केवल संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से पारित महाभियोग प्रस्ताव के बाद राष्ट्रपति ही हटा सकते हैं।

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